वो आख़िरी चिट्ठी – भाग 1 : मुलाक़ात
कॉलेज का वो पहला दिन, जब सबकुछ नया था — क्लासरूम, चेहरें, और माहौल।
आरव थोड़ा शांत स्वभाव का था, किताबों में खोया रहने वाला। दोस्त उसे “फिलॉसफर” बुलाते थे क्योंकि वो हर बात को गहराई से सोचता था।
पहली क्लास में जब उसने पीछे मुड़कर देखा, तो खिड़की के पास बैठी एक लड़की पर नज़र ठहर गई —
सफेद कुर्ता, खुले बाल, और मुस्कान जिसमें जैसे शांति छुपी हो।
वो मायरा थी।
पहली नज़र में प्यार नहीं था, लेकिन कुछ ऐसा था जिसने आरव के दिल में हल्की-सी खामोशी छोड़ दी।
जैसे कोई पुरानी धुन कानों में धीरे से गूँज गई हो।
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☕ कॉफी और किताबें
दो हफ़्ते बाद, कॉलेज की लाइब्रेरी में मायरा से पहली बार बात हुई।
वो “द अलकेमिस्ट” किताब ढूँढ रही थी, और वो किताब आरव के हाथ में थी।
“Excuse me, ये किताब आपको सच में पढ़नी है?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा।
आरव थोड़ा झेंपा, “हाँ… पर अगर आप चाहें तो साथ में पढ़ सकते हैं।”
वो हँसी — “साथ में? किताबें पढ़ी जाती हैं या महसूस की जाती हैं?”
यहीं से शुरुआत हुई —
कॉफी, किताबें, और छोटी-छोटी बातों की एक ऐसी कहानी, जिसने दोनों को एक-दूसरे की ज़िंदगी का हिस्सा बना दिया।
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🌧️ बारिश की वो शाम
एक दिन जब कॉलेज बंद था, आरव अकेले कैंपस में बैठा बारिश देख रहा था।
मायरा आई — बिना छतरी, बिना किसी डर के, जैसे बारिश उसकी दोस्त हो।
“पागल हो तुम,” आरव ने कहा।
“हाँ,” मायरा बोली, “पर हर बारिश में कुछ मिटता है और कुछ नया बनता है।”
आरव ने मुस्कुराकर कहा, “अगर मैं भी मिट जाऊँ तो?”
मायरा बोली — “तो मैं तुम्हें यादों में फिर से लिख दूँगी।”
वो शाम आरव कभी नहीं भूल पाया।
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💞 रिश्ता या एहसास?
धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे लगने लगे।
कोई इज़हार नहीं, कोई वादा नहीं — बस एहसास।
मायरा हमेशा कहती —
“प्यार वो नहीं जो कह दिया जाए, प्यार वो है जो महसूस हो और फिर भी छुपा रह जाए।”
आरव उसे समझना चाहता था, लेकिन मायरा के अंदर एक रहस्य था।
कभी-कभी वो बहुत खुश रहती, तो कभी घंटों चुप।
एक दिन आरव ने पूछा,
“मायरा, तुम्हें किस बात का डर है?”
वो बोली, “कुछ डर ऐसे होते हैं जिन्हें नाम देने से वो सच हो जाते हैं।”
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📜 चिट्ठी
सेमेस्टर खत्म होने के एक दिन पहले, मायरा ने आरव को एक सफेद लिफाफा दिया।
“इसे तब खोलना जब मैं तुम्हारे आसपास न रहूँ,” उसने कहा।
आरव ने हँसते हुए कहा, “कहाँ जा रही हो?”
मायरा बोली, “शायद वहीं, जहाँ किसी की यादें भी नहीं पहुँच पातीं।”
अगले दिन मायरा कॉलेज नहीं आई।
फिर कभी नहीं आई।
आरव ने हज़ार कोशिशें कीं — फोन, दोस्त, सोशल मीडिया — लेकिन वो जैसे गायब हो गई थी।
उसने लिफाफा खोला…
अंदर सिर्फ एक लाइन लिखी थी —
> “अगर तुम सच में मुझे समझते हो, तो मुझे ढूँढने मत आना।”
आरव के हाथ काँप गए।
और उसके आँसू उस चिट्ठी पर गिरकर स्याही फैला गए।
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🕯️ End of Part 1
रहस्य यहीं से शुरू होता है…
क्यों मायरा चली गई?
क्या हुआ था उसके अतीत में?
और वो आख़िरी चिट्ठी असल में किस कहानी का हिस्सा थी?
👉 Part 2 में पता चलेगा कि मायरा की ज़िंदगी में ऐसा क्या राज़ था जिसने उसे सबकुछ छोड़ने पर मजबूर कर दिया…