🕯️ इश्क़ का आख़िरी ख़त
भाग 1 – मुलाक़ात की खुशबू
रात के बारह बज चुके थे। शहर की सड़कें खाली थीं, बस कभी-कभी किसी गाड़ी की हैडलाइट अँधेरे को चीर जाती।
आरव अपने छोटे से फ्लैट की बालकनी में बैठा था, हाथ में पुराना खत लिए।
काग़ज़ पीला पड़ चुका था, मगर उस पर लिखी स्याही अब भी जिंदा थी — ठीक वैसे ही जैसे किसी पुराने ज़ख्म की टीस जो भरने का नाम ही नहीं लेती।
“अगर कभी मेरे बिना जीना सीख जाओ, तो समझ लेना कि मैं सच में चली गई हूँ…”
खत की आख़िरी लाइन थी — “– मेहर”
आरव की उंगलियाँ काँप रही थीं। उसे वो दिन याद था जब उसने पहली बार मेहर को देखा था — यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में।
बारिश की हल्की बूँदें खिड़की से अंदर आ रही थीं, और वो किसी पुराने उर्दू शायर की किताब पढ़ रही थी।
उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो शब्दों से बाहर था — जैसे कोई कहानी जो कभी लिखी ही नहीं गई।
वो उस पल से ही बिखर गया था… और शायद जुड़ भी गया था।
भाग 2 – प्यार या पहेली
दिन हफ्तों में बदले, और मेहर उसकी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत सच बन गई।
वो लड़की जो खामोशी से बातें करती थी, जिसके होंठ मुस्कुराते थे पर आँखें कुछ छुपाती थीं।
कई बार आरव ने पूछा —
“मेहर, क्या हुआ था तुम्हारे साथ?”
वो बस मुस्करा देती, “कुछ बातें वक्त के पास ही रहने दो, आरव।”
एक दिन उसने आरव से कहा,
“अगर मैं कल चली जाऊँ, तो तुम क्या करोगे?”
आरव ने हँसकर कहा, “तब मैं खुद को खत्म कर लूँगा।”
मेहर ने बस उसकी आँखों में देखा और कहा,
“प्यार का इम्तिहान मौत नहीं होता, आरव… बल्कि जीना होता है, उसके बिना।”
उस रात मेहर पहली बार रोई थी — और शायद आख़िरी बार भी।
भाग 3 – गुमशुदगी
अगली सुबह आरव ने उसे कॉल किया —
फोन बंद।
उसका घर — ताला लगा हुआ।
कॉलेज में पूछा — “मेहर? उसने तो पिछले हफ़्ते ही छुट्टी ली थी।”
उसके बाद से मेहर कभी नहीं दिखी।
पुलिस रिपोर्ट, सोशल मीडिया, दोस्तों से पूछताछ — सब बेकार।
मेहर जैसे हवा में घुल गई थी।
सिर्फ़ एक चीज़ छोड़ी थी उसने —
एक खत।
जो डाक से आया था, बिना भेजने वाले के नाम के।
और बस लिखा था —
“कुछ राज़ ऐसे होते हैं जो इश्क़ से भी गहरे होते हैं।”
भाग 4 – सच्चाई की दरारें
तीन साल बीत चुके थे।
आरव अब एक पत्रकार था — सच की तलाश में निकला एक बेचैन इंसान।
एक दिन उसे एक अजीब खबर मिली —
शहर के पुराने हॉस्पिटल में किसी “मेहर” नाम की लड़की की फाइल मिली है, जो 2009 से “अज्ञात मरीज” के नाम पर दर्ज थी।
आरव का दिल रुक गया — 2009?
पर उसने तो मेहर से 2017 में मुलाकात की थी…
वो भागा हॉस्पिटल की ओर।
फाइल खोली —
नाम: मेहर फ़ातिमा
स्थिति: कोमा (since 2009)
कमरा: 217
कमरा 217 में पहुंचते ही उसके कदम जम गए।
बिस्तर पर वही चेहरा था — मेहर का।
उसी मासूमियत के साथ, लेकिन अब बेहोश…
12 सालों से।
भाग 5 – कौन थी वो मेहर?
“ये मुमकिन नहीं है…” आरव बड़बड़ाया।
“मैं रोज़ उससे मिलता था, बात करता था, उसने मेरे साथ वक्त बिताया था…”
डॉक्टर ने कहा,
“बेटा, ये मरीज तो 2009 से कभी होश में नहीं आई।”
आरव के हाथ से खत गिर पड़ा।
वो वही खत था जो उसे तीन साल पहले मिला था।
पर अब उसे लगा — ये खत शायद असली नहीं था… या शायद दूसरी दुनिया से आया था।
भाग 6 – आख़िरी मुलाक़ात
उस रात आरव फिर कमरे 217 में गया।
खिड़की के पास बैठा और कहा,
“मेहर… अगर तुम सुन सकती हो, तो जान लो — मैं अब भी तुम्हें प्यार करता हूँ।”
हवा में वही खुशबू घुली — चमेली और बारिश की।
कमरे का मॉनिटर बीप करने लगा।
मेहर की उंगलियाँ हल्की सी हिलीं।
आरव रोने लगा।
और फिर मॉनिटर सीधी लाइन बन गया — beeeeeep…
उसके अगले दिन मीडिया में खबर थी —
“12 साल बाद कोमा से निकली लड़की की मौत।”
आरव ने कुछ नहीं कहा, बस अपने कमरे में जाकर लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक नया खत था —
“तुमने कहा था, मेरे बिना जी नहीं सकोगे…
अब देखना, मैं तुम्हारे साथ हमेशा रहूँगी — तुम्हारे शब्दों में, तुम्हारी कहानी में।
– मेहर”
भाग 7 – खुला अंत
आज भी आरव अपने ब्लॉग पर लिखता है —
हर कहानी में कोई “मेहर” ज़रूर होती है।
लोग पूछते हैं — “क्या मेहर सच में थी?”
वो बस मुस्कुरा देता है,
“पता नहीं… शायद थी, शायद नहीं।”
और जब कोई रात के अंधेरे में उसके ब्लॉग पर जाता है,
तो उसे हर पेज पर वही लाइन दिखती है —
“अगर कभी मेरे बिना जीना सीख जाओ, तो समझ लेना कि मैं सच में चली गई हूँ…”